मेने अपनी जिंदगी जी बेवजह कुछ शर्तों पर

शर्तों पर जीया जिंदगी कुछ इस तरह

मेने अपनी जिंदगी जी बेवजह कुछ शर्तों पर
मना लिया खुद को डोलते उसूलों में जकड़कर
शर्तें क्या थी ये पूरी तरह समझ न सका
बशर्ते खुद को झुका लिया परतों में रहकर

वो आंगन जो कभी खिला करता था
फूलों की खुशबुओं से महका करता था
ऐसा लगता है मानो, जैसे कोई चला गया,
उसे कुछ ही पल में रौंदकर

जिंदगी आसां यूँ तो न थी कभी
फिर भी आसां बनाने निकले थे हम
लोटे तो गलियारे की चौखट पर
खुद को पाया बाहें फैलाकर

शर्तें भी मेरी थी शायद वक़्त भी मेरा था
गर कोई न आया मुझे अपना जताकर
ठोकरें लगी फिर भी होश न आया
जाने क्या किया मेने खुद को
अनजाने चेहरों में ढालकर
मेने अपनी जिंदगी जी बेवजह कुछ शर्तों पर।

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